कहाँ मिलता है कोई समझने वाला जो भी मिलता है बस समझाके चला जाता है
वक़्त से पहले हादसों से लड़ा हूँ मैं अपनी उम्र से कई साल बड़ा हूँ
ज़ाया न कर अपने अल्फ़ाज़ हर किसी के लिए ख़ामोश रह कर देख तुझे समझता कौन है ।
ज़िंदगी ने मेरे मर्ज़ का एक बढ़िया इलाज़ बताया और मतलबियों से परहेज़ बताया ।
ख़ामोशी से भी बड़े नेक काम होते है मैंने देखा है पेड़ो को छाँव देते हुए ।
यूँ अकड़ कर तो मिल ही जायेगी सलामी तुम्हें दुआ के लिए तुम्हें सर झुकाना ही पड़ेग
एक उसूल पर गुज़ारी है ज़िंदगी मैंने जिसको भी अपना माना , उसको कभी परखा नहीं ।
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